Tuesday, October 6, 2026

रूस की राजधानी मॉस्को में अफगानिस्तान को लेकर हुई कूटनीतिक हलचल ने एक बार फिर भारत, पाकिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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रूस की राजधानी मॉस्को में अफगानिस्तान को लेकर हुई कूटनीतिक हलचल ने एक बार फिर भारत, पाकिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

मामला है Moscow Format का… एक ऐसा मंच जहां अफगानिस्तान की सुरक्षा, आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य को लेकर कई देशों के प्रतिनिधि अपनी बात रखते हैं।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा ध्यान भारत के रुख पर है।

क्योंकि अफगानिस्तान को लेकर भारत की चिंता सिर्फ काबुल तक सीमित नहीं है। भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल है—अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी आतंकवादी संगठन या बाहरी ताकत द्वारा भारत के खिलाफ तो नहीं किया जाएगा?

और इसी मुद्दे पर भारत लगातार एक स्पष्ट नीति की बात करता रहा है।

दरअसल, Moscow Format की बैठकों में भारत और पाकिस्तान दोनों की मौजूदगी इस मंच को और महत्वपूर्ण बना देती है। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं, लेकिन अफगानिस्तान का भविष्य ऐसा विषय है जिसका असर दोनों देशों की सुरक्षा पर सीधे पड़ता है।

अब जरा समझिए कि Moscow Format आखिर है क्या?

Moscow Format अफगानिस्तान को लेकर क्षेत्रीय देशों के बीच बातचीत का एक कूटनीतिक मंच है। इसमें रूस के साथ भारत, चीन, पाकिस्तान, ईरान और मध्य एशियाई देशों जैसे कई देश शामिल रहे हैं।

इस मंच का मकसद अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करना है।

4 अक्टूबर 2024 को हुए Moscow Format Consultations के संयुक्त बयान में भारत, पाकिस्तान, रूस, चीन, ईरान और मध्य एशियाई देशों समेत कई प्रतिभागियों ने अफगानिस्तान में आतंकवाद की स्थिति पर चिंता जताई थी।

संयुक्त बयान में कहा गया था कि अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी और अलगाववादी समूह क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं।

साथ ही अफगानिस्तान की वास्तविक सत्ता पर काबिज अधिकारियों से यह भी कहा गया था कि वे आतंकवादी समूहों के खिलाफ दिखाई देने वाली और सत्यापित कार्रवाई करें तथा अफगान जमीन को पड़ोसी देशों और क्षेत्र के खिलाफ इस्तेमाल होने से रोकें।

यही वह बिंदु है जहां भारत का सुरक्षा दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत का लगातार जोर रहा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए नहीं होना चाहिए।

क्योंकि भारत पहले ही अफगानिस्तान में बड़े स्तर पर विकास परियोजनाओं में योगदान दे चुका है।

भारत का अफगानिस्तान के साथ जुड़ाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। भारत ने सड़क, बिजली, बांध, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी अफगानिस्तान में काम किया है।

यानी भारत के लिए एक स्थिर और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान केवल रणनीतिक जरूरत नहीं बल्कि क्षेत्रीय विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है।

अब सवाल उठता है कि पाकिस्तान की भूमिका यहां क्यों महत्वपूर्ण हो जाती है?

अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा, सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दे लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रहे हैं।

भारत का रुख यह रहा है कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और किसी भी देश की जमीन को दूसरे देश के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।

यही वजह है कि जब Moscow Format जैसे मंच पर भारत और पाकिस्तान एक ही टेबल पर होते हैं, तो वहां होने वाली हर बात को रणनीतिक नजरिए से देखा जाता है।

लेकिन इसे सिर्फ भारत बनाम पाकिस्तान की लड़ाई के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

क्योंकि रूस का अपना रणनीतिक हित है।

चीन की अपनी चिंताएं हैं।

ईरान की अपनी सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं।

और मध्य एशियाई देशों के लिए अफगानिस्तान की सीमा से निकलने वाला आतंकवाद, ड्रग्स और अस्थिरता सीधा सुरक्षा खतरा बन सकती है।

इसलिए Afghanistan का मुद्दा अब केवल Afghanistan का मुद्दा नहीं रह गया है।

यह पूरे क्षेत्र की सुरक्षा का सवाल बन चुका है।

और यही कारण है कि रूस भी अफगानिस्तान में ऐसी स्थिति चाहता है जहां आतंकवादी संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा न बनें।

भारत और रूस के बीच अफगानिस्तान को लेकर सहयोग कोई नई बात नहीं है।

भारत और रूस ने लंबे समय से Afghanistan से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत की है। दोनों देशों ने आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर कई मौकों पर साझा चिंता व्यक्त की है।

यानी Moscow Format में भारत की मौजूदगी को अचानक पैदा हुआ घटनाक्रम समझना सही नहीं होगा।

भारत लंबे समय से Afghanistan को लेकर अलग-अलग क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय रहा है। विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार भारत ने Moscow Format समेत कई अंतरराष्ट्रीय Afghanistan सम्मेलनों में हिस्सा लिया है।

अब यहां एक और बड़ा सवाल आता है—

क्या Russia Afghanistan के मुद्दे पर India और Pakistan के बीच किसी तरह का संतुलन बनाने की कोशिश करता है?

इसका जवाब सीधा हां या ना में देना मुश्किल है।

Russia के लिए प्राथमिकता Afghanistan में स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा है।

भारत की प्राथमिकता है कि आतंकवाद का खतरा न बढ़े और Afghanistan की जमीन भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न हो।

वहीं Pakistan की Afghanistan को लेकर अपनी सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं हैं।

इसलिए Moscow Format में हर देश अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से अपनी स्थिति रखता है।

लेकिन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि Afghanistan की सुरक्षा का मुद्दा केवल किसी एक देश की समस्या नहीं है।

अगर Afghanistan में आतंकवादी नेटवर्क मजबूत होते हैं, तो उसका असर पड़ोसी देशों के साथ-साथ पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

इसी वजह से Moscow Format के संयुक्त बयानों में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और Afghan territory को दूसरे देशों के खिलाफ इस्तेमाल न होने देने पर जोर दिया गया है।

अब बात आती है उस 'ऐलान' की जिसका जिक्र इस खबर के शीर्षक में किया जा रहा है।

यहां यह समझना जरूरी है कि Moscow Format के आधिकारिक दस्तावेजों में किसी एक देश के खिलाफ युद्ध या सीधी सैन्य कार्रवाई की घोषणा जैसी बात नहीं है।

बल्कि मुख्य जोर Afghanistan को एक स्वतंत्र, एकजुट और शांतिपूर्ण देश बनाए रखने, आतंकवाद से निपटने और क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत करने पर रहा है।

यानी कूटनीति की भाषा में संदेश काफी स्पष्ट है—

अफगानिस्तान की जमीन किसी भी आतंकवादी संगठन के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं बननी चाहिए।

और क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा को नजरअंदाज करके Afghanistan में स्थायी शांति हासिल करना मुश्किल होगा।

यही कारण है कि Moscow Format आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

क्योंकि Afghanistan में स्थिरता का सवाल भारत, पाकिस्तान, रूस, चीन, ईरान और मध्य एशिया—सभी से जुड़ा हुआ है।

भारत के लिए यह मंच अपनी सुरक्षा चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

और रूस के लिए यह Afghanistan पर क्षेत्रीय संवाद बनाए रखने का एक अहम प्लेटफॉर्म है।

तो कुल मिलाकर Moscow Format का पूरा घटनाक्रम किसी एक देश की जीत या हार की कहानी नहीं है।

यह Afghanistan के भविष्य, आतंकवाद के खतरे और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चल रही एक लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया है।

भारत का संदेश लगातार यही रहा है कि Afghanistan में शांति जरूरी है, लेकिन ऐसी शांति जिसमें आतंकवाद के लिए कोई जगह न हो और जिसकी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ न किया जाए।

अब आने वाले समय में देखना होगा कि Moscow Format के जरिए Russia, India, Pakistan और दूसरे क्षेत्रीय देश Afghanistan को लेकर किस तरह की साझा रणनीति पर आगे बढ़ते हैं।

क्या Afghanistan वास्तव में आतंकवाद से मुक्त और स्थिर क्षेत्र बन पाएगा?

क्या क्षेत्रीय देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर Afghanistan पर सहयोग बढ़ा पाएंगे?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया में भारत की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व मिलेगा?

इन सवालों के जवाब आने वाले समय की घटनाओं से सामने आएंगे।

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