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आखिर कौन थे अली खामनेई?
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की राजनीति पूरी तरह बदल गई।
1989 में अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद अली खामनेई देश के दूसरे सुप्रीम लीडर बने।
करीब 37 वर्षों तक उन्होंने ईरान की विदेश नीति, सेना, न्यायपालिका और परमाणु कार्यक्रम पर निर्णायक प्रभाव बनाए रखा।
राष्ट्रपति बदलते रहे...
सरकारें आती-जाती रहीं...
लेकिन अंतिम फैसला हमेशा सुप्रीम लीडर का माना जाता था।
यही वजह है कि उन्हें ईरान का सबसे ताकतवर व्यक्ति कहा जाता था।
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मौत के बाद भी क्यों बरकरार है उनका प्रभाव?
किसी भी बड़े नेता की असली ताकत उसकी मौत के बाद दिखाई देती है।
अगर उसके जाने के बाद संगठन टूट जाए...
तो समझिए नेतृत्व व्यक्ति पर टिका था।
लेकिन अगर व्यवस्था पहले की तरह चलती रहे...
तो माना जाता है कि विचारधारा संस्थाओं में बदल चुकी है।
ईरान इसी संदेश को दुनिया के सामने रखना चाहता है।
यानी...
"नेता चला गया है...
लेकिन इस्लामिक रिपब्लिक पहले की तरह मजबूत है।"
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उत्तराधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
खामनेई के बाद नए नेतृत्व के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं।
एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ लगातार तनाव...
दूसरी तरफ आर्थिक प्रतिबंध...
तेल निर्यात पर दबाव...
महंगाई...
और युवाओं के बीच बढ़ता असंतोष।
ऐसे माहौल में नए नेतृत्व को यह साबित करना होगा कि वह देश को स्थिर रख सकता है।
इसीलिए अंतिम संस्कार को राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन भी माना जा रहा है।
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क्या बदलेगी ईरान की विदेश नीति?
दुनिया का सबसे बड़ा सवाल यही है।
क्या नए नेतृत्व के आने के बाद ईरान नरम रुख अपनाएगा?
क्या परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत होगी?
क्या अमेरिका के साथ रिश्तों में सुधार होगा?
या फिर पहले से भी ज्यादा आक्रामक नीति अपनाई जाएगी?
फिलहाल इन सवालों के जवाब साफ नहीं हैं।
लेकिन इतना जरूर है कि आने वाले कुछ महीने पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति तय कर सकते हैं।
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दुनिया क्यों देख रही है यह जनाज़ा?
हर बड़ा देश...
हर खुफिया एजेंसी...
और हर रणनीतिक विश्लेषक...
इस अंतिम यात्रा पर नजर बनाए हुए है।
क्योंकि यह केवल लाखों लोगों की भीड़ नहीं...
बल्कि यह बताने की कोशिश भी है कि ईरान के साथ आज भी कौन-कौन खड़ा है।
अगर बड़ी संख्या में विदेशी प्रतिनिधि और सहयोगी देश शामिल होते हैं...
तो इसे ईरान की कूटनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में देखा जाएगा।
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क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
1979 की इस्लामिक क्रांति...
1989 में खुमैनी का निधन...
और अब खामनेई की विदाई।
ईरान एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है...
जहां एक युग समाप्त हो रहा है...
और दूसरा शुरू होने वाला है।
इतिहास गवाह है...
ऐसे बदलाव अक्सर पूरे क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करते हैं।
इसलिए दुनिया सिर्फ एक जनाज़ा नहीं देख रही...
बल्कि भविष्य के मध्य-पूर्व की झलक देखने की कोशिश कर रही है।
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3000 किलोमीटर की अंतिम यात्रा...
चार महीने का इंतजार...
लाखों लोगों की भीड़...
दर्जनों देशों की मौजूदगी...
और पूरी दुनिया की नजरें...
यह कहानी सिर्फ अली खामनेई की नहीं है।
यह कहानी है उस ईरान की...
जो अपने सबसे बड़े नेता को विदाई देते हुए दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि उसके इरादे, उसकी विचारधारा और उसका प्रभाव अभी खत्म नहीं हुआ है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है...
क्या यह जनाज़ा एक युग का अंत है...
या फिर एक नए और अधिक आक्रामक ईरान की शुरुआत?
इस सवाल का जवाब आने वाला समय देगा।
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