अमेरिका की तरफ से भारत पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की तलवार लटक रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह है रूस से भारत की तेल खरीदारी।
अमेरिकी संसद में आगे बढ़ रहे रूस प्रतिबंध विधेयक में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत को भी संभावित प्रभावित देशों की सूची में शामिल किया गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 फीसदी टैरिफ स्वतः लागू हो चुका है—अंतिम फैसला आगे की विधायी प्रक्रिया और राष्ट्रपति के निर्णय पर निर्भर करेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल है—अगर अमेरिका दबाव बढ़ाता है, तो क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?
फिलहाल तस्वीर बिल्कुल सीधी नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा, कीमत, सप्लाई और घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखकर रूस से कच्चा तेल खरीदता रहा है। जून 2026 में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था।
यानी मामला सिर्फ भारत-अमेरिका का नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा जरूरतों और उसकी विदेश नीति से भी जुड़ा है।
और इसी बीच BRICS का मंच भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन में भारत समेत सदस्य देशों ने एकतरफा प्रतिबंधों और टैरिफ बाधाओं पर चिंता जताई और स्थानीय मुद्राओं तथा सीमा-पार भुगतान व्यवस्था में सहयोग बढ़ाने की बात कही।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत में भी दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक करीब 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी दोहराया।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर टैरिफ का दबाव कितना बढ़ाता है और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, रूस के साथ रिश्तों और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन कैसे बनाता है।
एक तरफ अमेरिका का टैरिफ दबाव है, दूसरी तरफ रूस से ऊर्जा संबंध और तीसरी तरफ BRICS के जरिए ग्लोबल साउथ में बढ़ता सहयोग।
आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका-रूस के बीच यह आर्थिक और कूटनीतिक समीकरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बड़ी कहानी बन सकता है।
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