Sunday, September 20, 2026

हालिया रिपोर्टों में अजित डोभाल ने अपने शुरुआती खुफिया करियर का एक बेहद तनावपूर्ण चीन-संबंधी अनुभव साझा किया है। सितंबर 2026 में IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में उन्होंने बताया कि सिक्किम में तैनाती के दौरान उनकी निगरानी में गया एक दल तय समय पर वापस नहीं लौटा और बाद में पता चला कि वह चीनी कब्जे में था। डोभाल ने कहा कि उस समय उन्हें लगा था कि उनका करियर खत्म हो गया।

Ajit Doval News: अजित डोभाल के पीछे कौन पड़ा! बयान से हड़कंप, खतरे में भारत?

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का एक बयान इन दिनों चर्चा में है। आखिर ऐसा क्या हुआ था, जब एक खुफिया मिशन के बाद डोभाल को लगा कि उनका पूरा करियर खत्म हो सकता है?

दरअसल, IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में अजित डोभाल ने अपने शुरुआती खुफिया करियर की एक पुरानी घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब वह युवा IPS अधिकारी के तौर पर सिक्किम में तैनात थे, तब सीमा क्षेत्र में निगरानी के लिए एक टीम भेजी गई थी।

टीम को तय समय पर वापस लौटना था, लेकिन कई दिन तक उसकी कोई खबर नहीं मिली। डोभाल ने बताया कि उस समय उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी। बाद में मुख्यालय से उन्हें फोन आया और बताया गया कि टीम के लोग चीनी कब्जे में हैं।

डोभाल के मुताबिक उस वक्त उन्हें लगा कि यह घटना उनके करियर का अंत कर सकती है। हालांकि बाद में हुई जांच में उन्हें इस मामले के लिए जिम्मेदार नहीं पाया गया।

अब सवाल उठता है—क्या इस पुराने अनुभव का आज की भारत-चीन सुरक्षा चुनौती से कोई संबंध है?

आज भारत के सामने सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर खतरे और बदलती भू-राजनीति जैसी कई चुनौतियां हैं। खुद डोभाल पहले भी कह चुके हैं कि भारत को बाहरी और आंतरिक दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और कुछ देश भारत की बढ़ती ताकत को अपने हितों के लिए चुनौती मानते हैं।

लेकिन यह साफ करना जरूरी है कि हालिया रिपोर्टों में अजित डोभाल पर किसी नए हमले या तत्काल व्यक्तिगत खतरे की पुष्टि नहीं हुई है। वायरल दावों और वास्तविक सुरक्षा घटनाओं के बीच अंतर रखना जरूरी है।

तो डोभाल के इस बयान ने एक बार फिर भारत की खुफिया और राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े पुराने सवालों को चर्चा में ला दिया है।

आखिर उस मिशन में क्या हुआ था? चीनी सेना ने भारतीय एजेंटों को कैसे पकड़ा? और उस घटना से डोभाल ने क्या सीखा?

आपको क्या लगता है, क्या ऐसे पुराने अनुभव आज की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को समझने में महत्वपूर्ण हैं? अपनी राय कमेंट में बताइए।