तक जगत (Tech Industry) से आई एक सनसनीखेज रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो सालों से दुनिया भर में मची आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की धूम अब फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, उबर और ओपनएआई जैसी जिन बड़ी कंपनियों ने एआई को अपनाने के नाम पर लाखों कर्मचारियों की छंटनी कर दी थी, वे अब खुद एक बड़े संकट में फंसती नजर आ रही हैं। 00:01 Opens in a new window Jagran Josh की इस वीडियो रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: इंसानों से महंगा पड़ रहा है AI: रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि इंसानी लेबर (Human Labor) के मुकाबले एआई को मेंटेन करना कंपनियों के लिए बहुत ज्यादा खर्चीला और महंगा साबित हो रहा है। 00:27 Opens in a new window डॉट-कॉम बबल (Dot-Com Bubble) जैसा डर: जानकारों को एआई का यह दौर साल 1990 के डॉट-कॉम बबल जैसा नजर आ रहा है, जब इंटरनेट के नाम पर हजारों कंपनियां खुलीं, भारी निवेश हुआ और फिर अचानक पूरा मार्केट क्रैश हो गया था। 01:06 Opens in a new window अंधाधुंध बुनियादी ढांचागत खर्च: एआई कोई साधारण सॉफ्टवेयर नहीं है। इसके पीछे अरबों रुपयों के डेटा सेंटर, महंगे एनवीडिया (Nvidia) के जीपीयू चिप्स और भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है, जिसके कारण कंपनियों का बजट बिगड़ रहा है। 01:41 Opens in a new window कंपनियों के बिगड़े बजट: * Microsoft जैसी दिग्गज कंपनी ने क्लाउड एआई के कई लाइसेंस सिर्फ इसलिए कैंसिल कर दिए क्योंकि वे बेहद महंगे पड़ रहे थे। 02:02 Opens in a new window मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक बड़ी कंपनी का एआई बिल कुछ ही महीनों में 500 मिलियन डॉलर (करीब ₹4200 करोड़) के पार चला गया। 02:11 Opens in a new window Uber का एआई सब्सक्रिप्शन बजट भी तय समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। 02:18 Opens in a new window छात्रों और युवाओं के लिए राहत की खबर: पिछले दो सालों से कोडिंग, कंटेंट राइटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग और डेटा एंट्री जैसे क्षेत्रों के छात्रों व युवाओं में अपनी नौकरी जाने का जो खौफ था, वह अब काफी हद तक कम हो सकता है। 02:30 Opens in a new window टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंसानों की क्रिएटिविटी, क्रिटिकल थिंकिंग और ग्राउंड वर्क आज भी एआई से कई गुना बेहतर और किफायती है। 02:51 Opens in a new window निष्कर्ष: एआई पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन केवल एआई के भरोसे बिजनेस चलाने और नौकरियों को पूरी तरह खत्म करने के जिस डर का माहौल बनाया गया था, उस अंधाधुंध रफ्तार पर अब ब्रेक लग गया है।