30 जनवरी 1948 की शाम, पूरा देश उस समय सदमे में डूब गया जब Mahatma Gandhi की दिल्ली के बिड़ला हाउस में गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या करने वाला व्यक्ति था Nathuram Godse, जो खुद को कट्टर राष्ट्रवादी बताता था। इस घटना ने आज़ाद भारत की राजनीति और समाज को हमेशा के लिए बदल दिया। हत्या के तुरंत बाद गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया। जांच में उसके साथ Narayan Apte समेत कई लोगों के नाम सामने आए। अदालत में चले लंबे ट्रायल के दौरान गोडसे ने अपने फैसले को सही ठहराने की कोशिश की। उसने कहा कि वह गांधी जी की नीतियों से नाराज़ था, खासकर पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम एकता को लेकर उनके रुख से। मुकदमे के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा गोडसे के उस बयान की हुई जिसमें उसने खुद को “देशभक्त” बताया। कोर्ट में उसने लंबा भाषण दिया और दावा किया कि उसने जो किया, वह देशहित में किया। हालांकि अदालत ने साफ कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक असहमति का जवाब हत्या नहीं हो सकता। 1949 में अदालत ने गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सजा सुनाई। कहा जाता है कि फांसी से पहले दोनों ने दया याचिका को लेकर ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। जेल अधिकारियों के अनुसार, आखिरी दिनों में गोडसे शांत दिखाई देता था और धार्मिक पुस्तकें पढ़ता था। 15 नवंबर 1949 की सुबह पंजाब के अंबाला जेल में दोनों को फांसी दी गई। उस समय सुरक्षा बेहद कड़ी थी क्योंकि पूरे देश में इस मामले को लेकर गुस्सा और तनाव था। फांसी के बाद सरकार ने इस घटना को लेकर किसी भी तरह की हिंसा या उग्र प्रतिक्रिया रोकने के लिए विशेष इंतजाम किए। आज भी Nathuram Godse का नाम भारत में बेहद विवादित माना जाता है। एक ओर लोग उसे गांधी जी का हत्यारा और लोकतंत्र का दुश्मन मानते हैं, वहीं कुछ कट्टर समूह उसे अलग नजरिए से पेश करने की कोशिश करते हैं। लेकिन भारतीय इतिहास में Mahatma Gandhi की हत्या को एक ऐसी त्रासदी माना जाता है जिसने देश की आत्मा को झकझोर दिया था।