Monday, August 31, 2026

India-Uzbekistan Uranium Deal: PM Modi के ऐलान से चीन की बढ़ी टेंशन? भारत ने सेंट्रल एशिया में एक ऐसा रणनीतिक दांव चला है, जिसका असर आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा से लेकर भू-राजनीति तक दिखाई दे सकता है।

India-Uzbekistan Uranium Deal: PM Modi के ऐलान से चीन की बढ़ी टेंशन? 

भारत ने सेंट्रल एशिया में एक ऐसा रणनीतिक दांव चला है, जिसका असर आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा से लेकर भू-राजनीति तक दिखाई दे सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उज्बेकिस्तान दौरे के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने रिश्तों को Comprehensive Strategic Partnership तक पहुंचाने का फैसला किया है।

लेकिन इस पूरे दौरे में सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे की हो रही है, वो है—यूरेनियम की लंबी अवधि की सप्लाई।

प्रधानमंत्री मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव के बीच बातचीत में भारत के लिए उज्बेकिस्तान से लंबे समय तक यूरेनियम सप्लाई की व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इसे अपनी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है।

अब सवाल है—भारत के लिए यूरेनियम इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

दरअसल, भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में परमाणु रिएक्टरों के लिए भरोसेमंद ईंधन सप्लाई बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

उज्बेकिस्तान के साथ यह सहयोग भारत को अपने न्यूक्लियर एनर्जी सप्लाई नेटवर्क को और मजबूत करने में मदद कर सकता है।

और कहानी सिर्फ यूरेनियम तक सीमित नहीं है।

भारत और उज्बेकिस्तान ने क्रिटिकल मिनरल्स, माइनिंग, ऊर्जा, डिफेंस, टेक्नोलॉजी, हेल्थ और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर से ज्यादा करने का लक्ष्य रखा है।

यानी भारत सेंट्रल एशिया में सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि ऊर्जा और रणनीतिक संसाधनों की अपनी मौजूदगी भी मजबूत कर रहा है।

यहीं से चीन का एंगल सामने आता है।

सेंट्रल एशिया लंबे समय से चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। चीन यहां व्यापार, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राकृतिक संसाधनों में अपना प्रभाव बढ़ाता रहा है।

ऐसे में भारत और उज्बेकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी का मजबूत होना और क्रिटिकल मिनरल्स तथा न्यूक्लियर एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ना निश्चित रूप से क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, अभी तक चीन की ओर से इस समझौते पर किसी विशेष “टेंशन” या आधिकारिक प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे चीन की घोषित प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव का संभावित असर समझना चाहिए।

सबसे बड़ी बात ये है कि भारत अब सेंट्रल एशिया को सिर्फ एक दूर का क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी एनर्जी सिक्योरिटी, ट्रेड और स्ट्रैटेजिक कनेक्टिविटी के अहम हिस्से के तौर पर देख रहा है।

और यही वजह है कि मोदी का उज्बेकिस्तान मिशन सिर्फ एक डिप्लोमैटिक विजिट नहीं, बल्कि भारत की बदलती रणनीतिक सोच का बड़ा संकेत माना जा रहा है।

यूरेनियम से लेकर क्रिटिकल मिनरल्स तक…
ट्रेड से लेकर डिफेंस तक…
भारत और उज्बेकिस्तान की ये नई साझेदारी आने वाले समय में सेंट्रल एशिया की तस्वीर बदल सकती है।

अब देखना होगा कि भारत इस रणनीतिक साझेदारी को कितनी तेजी से जमीन पर उतारता है।